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चिता पर लेटी महिला के पेट में हुआ ब्लास्ट और फिर हुआ कुछ ऐसा कि लोग फूट-फूट कर रोने लगे

आये दिन हम ऐसी ऐसी दुर्घटनाओ के बारे में पढ़ते है जो हमेशा के लिए आपको अंदर से हिला देती है और कुछ ऐसी ही भावनाओ का प्रतीक है ये खबर| डॉक्टरो की लापरवाही से एक गर्भवती महिला की जान चली जाती है लेकिन जब उसे उसके घरवाले चिता में रखकर जलाते है तो बहुत बड़ा धमाका होता है और जमीन पे लोग एक शिशु का शव पाते है|source

इस घटना ने एक बार फिर से अस्पतालों के फर्जी इलाजो और लापरवाही का कला चिठ्ठा सबके सामने लाकर रख दिया है| ये किस्सा है छत्तीसगढ़ के रायगढ़ का जहाँ एक परिवार ने अपनी बहु और नवजात शिशु को खो दिया|

डॉक्टर्स की लापरवाही से गयी एक गर्भवती महिला की जान

मामला थोडा पुराना है- 28 दिसम्बर का जब एक प्रसूता को अस्पताल में भर्ती कराया गये था| डॉक्टर ने 22 वर्षीय गर्भवती महिला को 17 जनवरी की तारिख दी थी लेकिन हाथ पैर में सूजन की वजह से उसे 24 दिसम्बर को ही भर्ती करा दिया गया था| उस वक़्त डॉक्टर्स ने कहा, ‘महिला के शरीर में सिर्फ 5 ग्राम ही हीमोग्लोबिन है।source

एडमिट की हुई महिला को 3 यूनिट ब्लड की जरूरत बताया और साथ ही ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव होने की जानकारी दी| जब परिवार वाले ब्लड लेकर पहुचे तो लैब के कर्मचारी ने ए निगेटिव ग्रुप का ब्लड लाने को कहा| एक बार फिर परिजन 1600 रूपए में ए नेगेटिव ब्लड खरीदकर अस्पताल पहुचे|

इसके बाद भी डॉक्टरो ने 2 यूनिट ब्लड की डिमांड और कर दी| परिवार वालो को 4,500 रूपए देकर एक बार फिर से ब्लड का अरेंजमेंट करना पड़ा| 29 दिसम्बर की सुबह जब वो ब्लड लेकर पहुचे तो महिला की मृत्यु हो चुकी थी|

बच्चे की लाश को देख पिता फूट फूट कर रोया- ‘कहा डॉक्टर्स ने ली है जान’source

 

 महिला के पति राजकुमार ने कहा “सोचा था पत्नी यहां ठीक हो जाएगी और बच्चे के साथ घर लौटूंगा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। पत्नी का शव लेकर लौटना पड़ा। डॉक्टरों ने उसके पेट में पल रहे बच्चे के बारे में भी हमें कुछ नहीं बताया। पत्नी का अंतिम संस्कार किया तो चिता पर ही उसके पेट से बच्चा बाहर आ गया। हम रोने के सिवाय कुछ नहीं कर पाए। अपने कलेजे के टुकड़े को सीने से भी नहीं लगा सका। डॉक्टर और स्टाफ ने मिलक दोनों की जान ले ली। अगर समय पर सही ब्लड ग्रुप की जानकारी दी होती तो पत्नी-बच्चा दोनों सुरक्षित होते।

कमला के साथ मेरी शादी 2015 में हुई थी। यह हमारा पहला बच्चा होता इसलिए घर में खुशी का माहौल था।मेरा संसार तो उजड़ गया पर अस्पताल में इलाज के नाम पर लापरवाही करने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि किसी और के घर की खुशियां न छीने।”

नोट: जब तक ऐसे अस्पताल और डॉक्टर्स समाज में है, क्या हम अपने परिजनों की जिंदगी दाँव पे लगा सकते है? भारत में हर दुसरे घंटे में कोई न कोई व्यक्ति ऐसे गलत इलाज के वजह से या तो बीमार होता है या अपनी जिंदगी खो देता है| अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में दें.

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