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आजकल मीडिया में पत्रकारों से ज़्यादा दलाल पाए जाते हैं …

प्राचीन काल की बात है जब पत्रकारों का काम हुआ करता था खबर को खबर की तरह लोगो के सामने पेश करना | पत्रकारिता का फ़र्ज़ होता था किसी भी खबर में बिना आपने विचार, धारणा और आरोप-प्रत्यारोप थोपे उसे प्रस्तुत करना | मिर्च-मसाले से दूर उस समय खबरें हम तक पहुँचा करती थी, चाहे वो टीवी से हो या रेडियो से |

दौर बदल गया है | पत्रकारिता को राजनीतिक दलाली के साधन की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है | अपनी अच्छाई, दूसरों की बुराई करवाने से लेकर अपनी बुराई और दूसरी पार्टियों की अच्छाई छुपाने तक के लिए समझौते किये जाते हैं | आरोप तो यह भी है की एक खबर से लेकर चैनल एंकर तक हर चीज़ की बोली लगती है |

अगर किसी की बोली नहीं लग सकती तो उसे दूसरे तरीकों से भी समझाया जाता है | ईमानदार पत्रकार होना काफी मुश्किल हो गया है आजकल के ज़माने में | प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया को शायद इस बात का अंदाज़ा भी नहीं लग रहा की वो खुद की नीलामी के साथ-साथ देश को भी बेच रहा है | सवा-सौ करोड़ से ऊपर लोग बस वही मान लेते हैं जो तुम कहते हो, वापस सवाल भी नहीं करते | और तुम, ज़रा सा भी नहीं सोचते उन्हें धोखा देने से पहले ?

पढ़िए कतई ईमानदार पत्रकार रजत शर्मा की करतूत !

ईमानदारी से हटकर एक और चीज़ है जिसे बेचकर कई पत्रकार खा चुके हैं | वह है, ‘शिष्टाचार’ | न्याय व्यवस्था से हटकर इनके स्टूडियो में अलग मुकदमें चलते हैं और फैसले किये जाते हैं की कौन दोषी है, कौन नहीं | डिबेट के नाम पर ज़बरदस्ती चीखा-चिल्लाया जाता है, बदतमीज़ी की जाती है, लोगों को ज़लील किया जाता है और इन मीडिया माफिया के आगे कोई कुछ कर भी नहीं सकता | अगर आपने आवाज़ उठायी तो चौबीसों घंटे चलने वाले ये चैनल आपकी इज़्ज़त तार-तार कर देंगे | बड़े-बड़े नेता, क्रिकेटर, सेलिब्रिटी इनके शिकार हुए हैं | आप बस एक ही काम कर सकते हैं, सामने वो पत्रकार आपको बेशक बेइज़्ज़त करता रहे लेकिन आप चुपचाप सिर्फ सुनते रहिये | क्योंकि लोगो तक बात पहुंचाने की ताकत सिर्फ उसके पास है, आपके पास नहीं |

धर्म, जात, समाज के नाम पर नेता तो क्या ही बाटेंगे उस से पहले ये मीडिया वाले बाँट देते हैं | हर चुनाव में बैठकर यह आंकलन लगाए जाते हैं कि हिन्दुओं ने किसे कितने वोट दिए, मुस्लिमों ने किसे कितने वोट दिया, दलित, ऊंची, नीची जाति का रुझान किधर है | यह सब किसलिए ! समाज को एक करने के लिए ?

work ethics of journalists in Media

आप ही बताइये आप मिर्च-मसाला, शोर-गुल, चीखम-चीखी, उलटी-सीधी, धर्म-कर्म, जात-पात वाली बहस देखना चाहते हैं या फिर सीधी-साधी खबर ! शायद आपको अंदाज़ा भी नहीं है कैसे आपके दिमाग के साथ खेला जा रहा है और आपकी सोच पर कब्ज़ा जमाया जा रहा है | वाक्य के आखिर में प्रश्नचिन्ह (?) लगाकर फैसले सुनाये जा रहे हैं | ताकि आप अपना दिमाग ही ना लगा पाएं बस वही मान लें जो TV पर दिख रहा है |

एक समय तो मीडिया वाले साबित कर चुके थे कि दुनिया ख़त्म हो जाएगी 2012 में आज 2017 है | सोचिये TRP के खेल के लिए किस तरह पागल बनाया जा रहा है |

आखिर कितने Tax देंगे हम ? देखिये यह दो मिनट की विडियो

इतना होने के बाद भी हर चैनल और हर पत्रकार में होड़ लगी है खुद को ईमानदार साबित करने की | थूकते हैं हम उन बिकाऊ पत्रकारों पर जो अपना ईमान बेचकर 4 पैसे कमा रहे हैं | वो दिन दूर नहीं जब चंद बाइक हुए पत्रकारों की वजह से पत्रकारिता को एक बहुत ही गन्दा पेशा माना जायेगा और पत्रकारों को दलालों की नज़रों से देखा जायेगा | प्रिय पत्रकार मित्रों, इज़्ज़त बचा लो अपने पेशे की |

आपसे भी अनुरोध है, आँख बंद कर सब-कुछ मत मानिये |अगर आपको किसी चैनल कि बातें लगातार निराधार लग रही हैं या आपको लगता है कि खबरों के नाम पर कोई चैनल या पत्रकार किसी विशेष पार्टी के समर्थन में प्रचार कर रहा है | तो उसे अपने DTH कनेक्शन से ही हटा दीजिये | एक मज़बूत सन्देश भेजने कि ज़रूरत है इन्हें | कृप्या देश और प्रजातंत्र बचने के लिए |

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